वीर रस के आलोक में राम का नायकत्व: रामचरितमानस का एक आलोचनात्मक एवं सांस्कृतिक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.64758/0g2vgn56Abstract
प्रस्तुत शोध-प्रबंध “वीर रस के आलोक में राम का नायकत्व: रामचरितमानस का एक आलोचनात्मक एवं सांस्कृतिक अध्ययन” रामचरितमानस में राम के नायकत्व की बहुआयामी संरचना का रस-सिद्धांत और सांस्कृतिक अध्ययन की संयुक्त दृष्टि से विश्लेषण करता है। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि राम का नायकत्व केवल युद्ध-पराक्रम तक सीमित नहीं, बल्कि धर्म-पालन, वचन-निष्ठा, करुणा, त्याग और लोकमर्यादा की स्थापना जैसे नैतिक आयामों से निर्मित होता है। वीर रस के स्थायी भाव ‘उत्साह’ को केंद्र में रखते हुए अध्ययन यह दर्शाता है कि राम में युद्धवीर, दयावीर और धर्मवीर—तीनों रूप अंतर्गुम्फित हैं, जिससे उनका चरित्र बहुरसीय स्वरूप ग्रहण करता है; साथ ही करुण और शान्त रस भी उनके नायकत्व को संतुलित और मानवीय बनाते हैं। शोध में रस-सिद्धांत आधारित पाठ-विश्लेषण, पूर्ववर्ती आलोचनात्मक परंपरा और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य (लोकपरंपरा, रामलीला, राष्ट्रीय चेतना) को समन्वित करते हुए यह स्थापित किया गया है कि राम भारतीय समाज में केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आदर्श लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार निष्कर्षतः यह अध्ययन प्रतिपादित करता है कि रामचरितमानस में वीर रस की प्रमुखता के बावजूद राम का नायकत्व बहुआयामी, नैतिक-सांस्कृतिक रूप से सक्रिय और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का स्थायी आदर्श है।
